जयशंकर प्रसाद (सन् 1889-1937)

जयशंकर प्रसाद का परिचय

जयशंकर प्रसाद का परिचय

जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी में हुआ।

वे विद्यालयी शिक्षा (स्कूल की पढ़ाई) केवल आठवीं कक्षा तक प्राप्त कर सके, किंतु स्वाध्याय द्वारा (स्वयं का अध्ययन करना) उन्होंने संस्कृत,पालि,उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं तथा साहित्य का गहन अध्ययन किया।

इतिहास, दर्शन,धर्मशास्त्र और पुरातत्व के वे प्रकांड विद्वान (एक बहुत बड़ा, उत्कृष्ट या श्रेष्ठ विद्वान व्यक्ति) थे।

प्रसाद जी अत्यंत सौम्य, शांत एवं गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे।

वे परनिंदा एवं आत्मस्तुति दोनों से सदा दूर रहते थे। 

वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। मूलतः वे कवि थे, लेकिन उन्होंने नाटक, उपन्यास, कहानी, निबंध आदि अनेक साहित्यिक विधाओं में उच्चकोटि की रचनाओं का सृजन किया।

प्रसाद-साहित्य में राष्ट्रीय जागरण का स्वर प्रमुख है। 

सम्पूर्ण साहित्य में विशेषकर नाटकों में प्राचीन भारतीय संस्कृति के गौरव के माध्यम से प्रसाद जी ने यह काम किया।

उनकी कविताओं, कहानियों में भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों की झलक मिलती है।

प्रसाद ने कविता के साथ नाटक, उपन्यास, कहानी संग्रह, निबंध आदि अनेक साहित्यिक विधाओं में लेखन कार्य किया है।

उनकी प्रमुख रचनाएं हैं- अजातशत्रु, स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, राजश्री, ध्रुवस्वामिनी (नाटक); कंकाल, तितली, इरावती (अपूर्ण) (उपन्यास), आँधी, इंद्रजाल, छाया, प्रतिध्वनि और आकाशदीप (कहानी संग्रह), काव्य और कला तथा अन्य निबंध (निबंध संग्रह), झरना, आँसू, लहर, कामायनी, कानन कुसुम, और प्रेमपथिक (कविताएँ)।

1. विद्यालयी शिक्षा – विद्यालय का ज्ञान, विद्यालय की पढ़ाई, स्कूल की शिक्षा/ पढ़ाई

2. प्राप्त – हासिल

3. किंतु – परन्तु, लेकिन।

4. स्वाध्याय द्वारा – by self-study” या “through self-study, खुद पढ़ने से

5.  गहन अध्ययन – गहराई से पढ़ाई

6.  अध्ययन – पढ़ाई

7.  प्रकांड – बहुत बड़ा

8.  विद्वान – शिक्षित व्यक्ति, ज्ञानी

9.  अत्यंत – अत्यधिक, बहुत अधिक

10. सौम्य व्यक्ति – शांत, दयालु, और कोमल स्वभाव वाला व्यक्ति

11. एवं – और, इसी प्रकार, तथा, ऐसे ही

12. गंभीर –  सोच-विचार करने वाला

13. प्रकृति – स्वभाव, मिजाज।

14. व्यक्ति – इंसान,मनुष्य,आदमी

15. परनिंदा – दूसरों की बुराई करना, निंदा करना, या आलोचना करना

16. आत्मस्तुति – अपनी खुद की तारीफ़ करना या स्वयं का गुणगान करना

17. सदा – हमेशा

18. बहुमुखी – अलग अलग तरह के कामों को करने में सक्षम होना/लायक होना

19. प्रतिभा –  talent, बुद्धि, समझ

20. धनी – मालिक, स्वामी।

21. मूलतः – मूल रूप में, शुरुआत में, पहले

22. अनेक – एक से अधिक।

साहित्य – मानव मन की भावनाओं और अनुभवों को व्यक्त करने वाली लिखित या मौखिक कला को साहित्य (लिखित) और मौखिक साहित्य (मौखिक) कहा जाता है।

23. साहित्यिक – साहित्य संबंधी

24. विधाओं –  शैलियों, तरीकों, ढंगों, अंदाज़ों

25. उच्चकोटि –  high class, ऊँचा दर्जा।

26. रचनाओं – काव्य या कविता है, जिसमें कवि चुने हुए शब्दों के ज़रिए कल्पना और मनोवेगों (भावों) को व्यक्त करता है।

27. सृजन करना – बनाना, निर्माण करना

28. नाटक – रंगमंच पर प्रदर्शन (दिखाना) के लिए लिखा गया एक साहित्यिक कार्य, जिसमें पात्रों(characters, किसी कहानी, नाटक या फिल्म में एक व्यक्ति को पात्र कहा जाता है।) के बीच संवाद(बातचीत) और अभिनय (acting, performance, drama) के माध्यम से(के द्वारा, द्वारा) कहानी को दर्शकों(audience, देखने वाले व्यक्ति को ‘दर्शक’ कहते हैं।) के सामने जीवंत(जीता-जागता) किया जाता है।

29. उपन्यास – उपन्यास काल्पनिक (कल्पना पर आधारित) भी हो सकता है और यथार्थ (वास्तविक जीवन पर आधारित) भी।

1. काल्पनिक उपन्यास (Fictional Novel) : ऐसे उपन्यास लेखक की कल्पना, कल्पित घटनाओं और पात्रों पर आधारित होते हैं। लेखक अपनी कल्पना से एक नई दुनिया, नए पात्र और घटनाएँ रचता है।

   उदाहरण: चंद्रकांता – देवकीनंदन खत्री

हैरी पॉटर – जे. के. रोलिंग (अंग्रेज़ी में)

2. यथार्थवादी उपन्यास (Realistic Novel) : ऐसे उपन्यास समाज, जीवन और वास्तविक घटनाओं को दर्शाते हैं। इनमें पात्र और प्रसंग तो काल्पनिक होते हैं, लेकिन वे वास्तविक जीवन जैसे लगते हैं।

उदाहरण: गोदान – मुंशी प्रेमचंद

               राग दरबारी – श्रीलाल शुक्ल

“कल्पना उपन्यास की आत्मा है।”
बिना कल्पना के उपन्यास केवल सूखी घटनाओं का विवरण बनकर रह जाता है।

30. कहानी – मनगढ़ंत बात, कथा।

31. निबंध –

32. आदि – इत्यादि, वग़ैरह।

33. प्रसाद-साहित्य – प्रसाद द्वारा रचित साहित्य

34. राष्ट्रीय जागरण – किसी समाज या राष्ट्र में चेतना, एकता और प्रगति की भावना का उदय होना।

35. स्वर – आवाज़

36. प्रमुख – आगे

37. संपूर्ण – पूरा

38. साहित्य – मानव मन की भावनाओं और अनुभवों को व्यक्त करने वाली लिखित या मौखिक कृतियाँ, जिनमें कलात्मक और सौंदर्यपूर्ण गुण होते हैं।

39. विशेषकर – ख़ासतौर पर, विशेष रूप से, खासकर,और बहुत ज्यादा

40. प्राचीन – पुराना

41. भारतीय संस्कृति – भारत की सभ्यता, परंपराएँ, जीवन-मूल्य, रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास, कला और सामाजिक जीवन

42. गौरव – सम्मान, आदर, इज़्ज़त

43. जीवन मूल्यों – उन सिद्धांतों और आदर्शों से है जो हमारे जीवन को दिशा देते हैं और हमारे कार्यों, निर्णयों और व्यवहारों को प्रभावित करते हैं

44. कहानी संग्रह –

45. कविता – 

46. लेखन कार्य – लिखने का काम

47. प्रमुख रचनाएं – किसी कलाकार की वे खास और महत्वपूर्ण कृतियाँ जो उस कलाकार के काम को परिभाषित करती हैं।

उदाहरण के लिए, किसी प्रसिद्ध लेखक की प्रमुख रचनाएँ उसके सबसे प्रशंसित उपन्यास या कविता संग्रह हो सकते हैं।

48. हूणों – एक प्राचीन आक्रामक मंगोल जाति से है, जो अपनी क्रूरता और विनाशकारी हमलों के लिए जानी जाती थी

49. आक्रमण – हमला

50. आर्यावर्त – 1.“आर्यों का निवास स्थान” या “श्रेष्ठ लोगों की भूमि”। यह प्राचीन भारत के एक हिस्से को संदर्भित करता है, जिसकी सीमाएं उत्तर में हिमालय और दक्षिण में विंध्य पर्वत श्रृंखलाओं से घिरी थीं।

2. प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में ‘उत्तरी भारत’ को आर्यावर्त (शाब्दिक अर्थ : आर्यों का निवासस्थान) कहा गया है।

51. संकट – ख़तरा

52. सहित – समेत, साथ

53. वीरगति – युद्ध भूमि में प्राण देना।

54. स्वप्न साकार – सपनों को हकीकत में बदलना

55. राष्ट्रसेवा – देश की उन्नति, सुरक्षा और कल्याण के लिए स्वैच्छिक(अपनी इच्छा से) या अनिवार्य रूप से सेवा करना, जिसमें ईमानदारी से काम करना,समाज की मदद करना और देश की एकता व अखंडता को बनाए रखना शामिल है। यह किसी भी नागरिक द्वारा अपनी क्षमता और परिस्थिति के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन करना है।

56. स्वप्न – सपना

57. अंतिम – आख़िरी

58. किंतु – लेकिन

59. वृद्ध – बुड्ढा।

60. आश्रम – साधु संतों की कुटी, मठ।

61. समाधि – किसी महान व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी यादगार में बनाए गए स्मारक या मक़बरा।

62. परिष्कृत – साफ़

63. अनुनय-विनय – विनम्रतापूर्वक निवेदन करना या प्रार्थना करना

64. आजीवन – जीवनभर, उम्र भर, ज़िंदगी भर

65. कुँवारा – 1. जिसकी शादी न हुई हो, अविवाहित।

2. जिस पुरुष का विवाह न हुआ हो उसे कुंवारा या अविवाहित पुरुष कहते हैं।

66. व्रत – प्रतिज्ञा, संकल्प या कसम

67. हृदय – दिल , मन

68. कोमल – मीठा

69. कल्पना – मन में आई कोई नई बात, विचार या कल्पना

70. हृदय की कोमल कल्पना सो जा – उन सपनों और उम्मीदों को त्यागने के लिए खुद को समझा रही है जो अब संभव(मुमकिन) नहीं हैं।

71. जीवन – ज़िंदगी

72. संभावना – हो सकने का भाव, मुमकिन होना।

73. द्वार – दरवाज़ा

74. भावी – भविष्य में होनेवाला।

75. आशा – उम्मीद

76. आकांक्षा – चाह, इच्छा।

77. विदा – प्रस्थान, रवाना होना, विदाई, रुख़्सत

78. वेदना – दर्द, कष्ट, पीड़ा, दुःख।

79. दृष्टिपात –    

80. अनुभव – काम की जानकारी, तजुर्बा।

81. अर्जित – कमाया हुआ।

82. वेदनामय – मानसिक या शारीरिक पीड़ा से भरा हुआ, यानी दुखद, कष्टदायक या दर्दनाक

83. क्षण – पल या समय की बहुत छोटी इकाई

84. अर्थात् – यानी, मतलब यह कि।

85. जीवन संध्या की बेला – जीवन का अंतिम पड़ाव या बुढ़ापा | यह वह समय होता है जब व्यक्ति अपने जीवन के अंतिम चरण मे होता है, अक्सर अकेलेपन, यादों, और जीवन के अनुभवों पर विचार करने के साथ। यह एक ऐसी बेला है जिसमें व्यक्ति अपने जीवन के उतार-चढ़ाव को महसूस करता है|

86. यौवन – युवावस्था, जवानी

87. क्रियाकलाप – 1. हरकत ,

2. किसी कार्य को करना, गतिविधि, या किसी विशेष प्रकार की सक्रियता। इसमें किसी व्यक्ति या समूह द्वारा किए जाने वाले सभी कार्य शामिल हैं, जैसे कि पढ़ाई, खेल या कोई व्यवसाय।

88. भ्रमवश – भ्रम के कारण या भ्रम में पड़कर। यह किसी ऐसी स्थिति को दर्शाता है जहाँ व्यक्ति गलतफहमी, संदेह, या धोखे में होने के कारण कोई काम करता है।

89. कर्म – काम, क्रिया

90. श्रेणी – category , पंक्ति

91. नादानी – बेवकूफ़ी , नासमझी, मूर्खता।

92. पश्चाताप – पछतावा, दुःख।

93. पश्चाताप स्वरूप – किसी गलत काम या पाप के लिए गहरा खेद और दुख महसूस करना, साथ ही उसे सुधारने की भावना रखना।

94. अजस्र – निरंतर, लगातार

95. स्वयं – अपने आप, खुद।

96. पूँजी – जमा किया हुआ धन

97. विडंबना – उपहास (मज़ाक) का विषय, चिढ़ाना, निंदा करना।

98. प्रलय – बर्बादी, अंत

99. स्वयं – खुद

100. जीवनरथ – जीवन की यात्रा को एक रथ के रूप में देखना है, जिसमें शरीर रथ है, मन घोड़े हैं, बुद्धि सारथी है, और इंद्रियाँ उन घोड़ों को नियंत्रित करने वाली रस्सियाँ हैं।

101. द्रुतमान –  तेज गति या शीघ्रता, तेज गति वाला

102. दुर्बलता – कमजोरी, बल या शक्ति की कमी

103. निश्चितता – किसी चीज़ के बारे में पूरी तरह से आश्वस्त होना(पक्का मान लेना, विश्वास करना या तसल्ली पाना।) या कोई संदेह न होना।

104. प्रलय – विनाश, बर्बादी, नाश

105. गीत का शिल्प – कविता और संगीत का एक संयोजन है, जिसमें भावनाओं, विचारों और अनुभवों को व्यक्त करने के लिए धुन, बोल और संरचना का उपयोग किया जाता है।

106. रची – बनाई

107. प्रकृति – भौतिक दुनिया, सभी जीवित प्राणियों (पौधे, जानवर), और निर्जीव चीजों (पहाड़, नदियाँ, तारे) के लिए है जो मनुष्यों द्वारा नहीं बनाए गए हैं।

108. भौतिक जगत – इसमें पृथ्वी के सभी जीवित और निर्जीव तत्व शामिल हैं, जैसे पौधे, जानवर, पहाड़, महासागर और तारे।

109. संबंध – लगाव

110. व्यक्त – साफ़, स्पष्ट

111. प्रसिद्ध गीत – ऐसा गीत जो बहुत लोकप्रिय हो या जिसका व्यापक प्रभाव हो।

112. गीत –

113. सेनापति – 1. फ़ौज या सेना का नायक

2. ‘सेना का प्रमुख’ या ‘सेनाध्यक्ष’, जो किसी भी सेना का मुख्य अधिकारी होता है। यह एक उपाधि है जिसका अर्थ ‘सेना का स्वामी’ होता है और यह एक सेना का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति को दिया जाता है।

114. सिंधु नदी – सिंधु नदी तिब्बत के मानसरोवर झील के पास से निकलती है, भारत के लद्दाख क्षेत्र से होकर गुजरती है, फिर पाकिस्तान में प्रवेश करती है और अंत में अरब सागर में मिल जाती है। यह नदी चीन, भारत और पाकिस्तान से होकर बहती है।

115. ग्रीक – ग्रीस (यूनान) से संबंधित व्यक्ति

116. शिविर – फौज के ठहरने की जगह, सैनिक शिविर

117. वृक्ष – पेड़

118. मनोहर तट – सुंदर किनारा, मन को मोह लेने वाला तट

119. मनोहर – 1. मन हरनेवाला।

2. सुंदर।

120. तट – 1. किनारा।

 2. नदी के किनारे की भूमि।

121. चित्रपट – जिसपर चित्र बनाया जाय वह तख़्ता, कपड़ा आदि।

122. उपस्थित – प्रस्तुत, हाज़िर।

123. वातावरण – पृथ्वी के चारों ओर की वायु।

124. प्रशांत स्निग्धता – शांत स्नेह

125. प्रशांत – अत्यधिक शांत, स्थिर।

126. स्निग्धता – प्रियता (प्रिय होने का भाव’ या ‘स्नेह/ गहरा लगाव)

127. निसर्ग – प्रकृति

128. रमणीय –

        सुंदर: बहुत अच्छा दिखने वाला।

        मनोहर: मन को लुभाने वाला।

        मनभावन: जो मन को प्रसन्न करे।

        अत्यधिक सुखदायक: जो आनंद और सुख दे।

129.भारतीय संगीत – भारत का संगीत

130. भारतीय संगीत – भारतीय संगीत का अर्थ गीत, वाद्य और नृत्य के संयोजन से है, जहाँ “संगीत” शब्द “सम” (साथ) और “गीत” (गायन) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है “गीत के साथ”।

131. अरुण यह मधुमय देश हमारा – यह देश सूर्योदय की तरह सुंदर, मधुर और सुखद है, जहां अज्ञात क्षितिज भी अपना सहारा पाता है।

132. गौरवगाथा – गर्व की कहानी या सम्मानजनक गाथा

133. तथा – और

134. प्राकृतिक सौंदर्य – प्रकृति के मूल और मौलिक रूप में मौजूद सुंदरता, जिसमें पर्वत, नदियाँ, जंगल, फूल, पेड़-पौधे और जानवर जैसे तत्व शामिल हैं।

135. भारतवर्ष की विशिष्टता – विविधता, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, भौगोलिक भिन्नता और सबसे बड़े लोकतंत्र होने में निहित है। यहाँ अनेक भाषाएँ, धर्म और परंपराएँ एक साथ मौजूद हैं, जो ‘विविधता में एकता’ का उदाहरण हैं। भारत का भौगोलिक क्षेत्र हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर रेगिस्तानों और समुद्र तटों तक फैला हुआ है, जो इसे एक अनोखी पहचान देता है।

136. ओर – तरफ

137. विशेषता – ख़ासियत

138. मायने – अर्थ

139. भारतवर्ष –“भरत के शासन वाला क्षेत्र” या “भरत का देश”। यह शब्द दो भागों से बना है: ‘भारत’ (पौराणिक सम्राट भरत के नाम पर) और ‘वर्ष’ (जिसका अर्थ है ‘भूमि’ या ‘क्षेत्र’)। इस प्रकार, भारतवर्ष का अर्थ है वह भूमि जिस पर भरत का शासन था, और इसका उपयोग प्राचीन काल से भारतीय उपमहाद्वीप के भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्र को संदर्भित करने के लिए किया जाता रहा है।

 देवसेना का गीत

आह! वेदना मिली विदाई!

1. देवसेना को जीवन के अंत में प्रेम और संघर्ष के कारण केवल दुख और अलगाव (विदाई) ही मिला है। उसने अपने जीवन की कमाई (सुख, अनुभव) को भ्रम में रहकर व्यर्थ गँवा दिया, जिससे उसे अंत में केवल पीड़ा ही प्राप्त हुई।

2. कवि (देवसेना) अपने जीवन के अंतिम समय में अपनी करारी हार और अलगाव पर गहरा दुःख व्यक्त कर रही है। उसे अपने जीवन के अंत में सिर्फ़ पीड़ा और बिछड़ने का एहसास ही मिला है।

मैंने भ्रम-वश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई।

इस पंक्ति का अर्थ है कि उसने जीवन भर जो भी सुख और अनुभव अर्जित किए थे, वे सब उसने भ्रम में रहकर, व्यर्थ ही लुटा दिए। जैसे मधुमक्खियाँ अपनी मेहनत से जमा की हुई शहद को दूसरों को दे देती हैं, वैसे ही उसने अपने जीवन की पूँजी को बर्बाद कर दिया।

“छलछल थे संध्या के श्रमकण, आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण”

छलछल थे संध्या के श्रमकण : शाम के समय, थकान भरे श्रम (मेहनत) के कारण आँखों से आँसू बह रहे थे, जो छलछल (पानी के छलकने की ध्वनि।) कर रहे थे।

आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण : यह आँसू हर क्षण (पल) टपक रहे थे, जो उसके गहरे दुख और हताशा (निराशा, दुःख।) को दिखाते हैं।

मेरी यात्रा पर लेती थी- नीरवता (खामोशी),(शांति) अनंत अँगड़ाई |

कवि का कहने का तात्पर्य है कि उसकी यात्रा के दौरान शांति इतनी गहरी और फैली हुई थी कि वह एक जीवित वस्तु की तरह महसूस हो रही थी, जो लंबे समय से थकी हुई हो।

श्रमित स्वप्न की मधुमाया में:

देवसेना जीवन की भाग-दौड़ से थक चुकी है और अपने प्रेम के अधूरे सपनों की मधुर स्मृतियों में खोई हुई है।

‘श्रमित’ का अर्थ- थका हुआ, जो श्रम या मेहनत के कारण थक गया हो। यह शब्द शारीरिक परिश्रम से थके हुए व्यक्ति का वर्णन करता है।

स्वप्न का अर्थ- नींद के दौरान मन में आने वाली छवियों, विचारों या भावनाओं की एक श्रृंखला के रूप में होता है, जो अक्सर अचेतन रूप से उत्पन्न होती हैं

मधुमाया – मीठी या सुखद यादें

गहन विपिन की तरु छाया में :
                                              1. वह अपनी इस निराशा और थकावट में एकांत और गहरी छाया (अंधेरे) की तरह महसूस                                                      करती है, जहाँ वह अकेली है।

                                              2. घने जंगल के पेड़ों की छाया में।

गहन घना

विपिन वन, जंगल

गहन विपिन – घना जंगल जीवन रूपी यात्रा में पल भर के सुखद आश्रय का प्रतीक है।

तरु छाया वृक्ष की छाया (पेड़ की छाया)| ‘तरु’ (वृक्ष) और ‘छाया’ (परछाई)

पथिक उनींदी श्रुति में :
                                  1. वह एक थके हुए पथिक की तरह है, जो नींद में है और जिसे अचानक कोई मधुर राग सुनाई देता                                          है।

                                  2. एक थके हुए, नींद में खोए हुए यात्री की स्मृति में

                                  3. एक थके हुए, नींद में खोए हुए यात्री के कान में

पथिक- 1. राही, बटोही ,यात्री ,मुसाफिर ,राहगीर

            2. थका हुआ यात्री या व्यक्ति।

उनींदी – अधूरी नींद में या ऊँघता हुआ।

नींद से भरी आँखें: जब कोई आँखें नींद से भरी हों, तो उन्हें ‘उनींदी आँखें’ कह सकते हैं।

श्रुति में : कान में।

किसने यह विहाग की तान उठाई :

स्कंदगुप्त के प्रेम के प्रस्ताव ने उसके इस पुराने दर्द और हताशा को और भी बढ़ा दिया है, जैसे कोई विहाग राग (एक प्रकार का उदास राग जो रात में गाया जाता है) उसके कानों में बज रहा हो।

लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी, रही बचाए फिरती कबकी :

इसका अर्थ है कि सब की लालची निगाहें (प्यार भरी, चाहत भरी) उस पर थीं और वह अपने प्रेम और यौवन को कब से बचा कर फिर रही थी।

सतृष्ण : प्यासा, इच्छुक।

दीठ : दृष्टि, निगाह।

मेरी आशा आह! बावली, तूने खो दी सकल कमाई :

यह पंक्ति देवसेना के लिए निराशा भरी है। वह अपनी आशा से कह रही है कि हे मूर्ख आशा! तूने अपनी सारी कमाई (स्कंदगुप्त से प्रेम की उम्मीद, जो उसने अपने जीवन में जमा की थी) खो दी है।

आशा : उम्मीद

सकल कमाई : सारी कमाई

चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर, प्रलय चल रहा अपने पथ पर :

देवसेना कहती है कि उसके जीवन के रथ पर (आराम से या बिना किसी बाधा के) प्रलय (विपत्तियाँ, दुख, संघर्ष) अपने रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।

प्रलय – नाश

पथ – रास्ता, मार्ग, राह

मैंने निज दुर्बल पद-बल पर, उससे हारी होड़ लगाई :

वह स्वीकार करती है कि उसने अपने कमजोर पैरों के बल पर ही इस प्रलय से प्रतिस्पर्धा (होड़) की, जिसमें उसकी हार निश्चित थी।

निज अपना

दुर्बल कमज़ोर

पद-बल पद (पाँव) से संबंधित बल या शक्ति

हारी जीत हारने वाला’ (पराजय)

होड़ – शर्त, बाज़ी ,प्रतिस्पर्द्धा

लौटा लो यह अपनी थाती :

यह अपनी धरोहर (या प्यार, अमानत) वापस ले लो

थाती का अर्थ: धरोहर, अमानत, या प्यार।

मेरी करुणा हा-हा खाती :

मेरी करुणा या दया / my compassion, हाहाकार कर रही है या बेतहाशा चीख रही है, और अब मुझसे इसे संभालना मुश्किल हो रहा है

विश्व न सँभलेगी यह मुझसे इससे मन की लाज गँवाई :

देवसेना कह रही है कि प्रेम की इस भावनात्मक उलझन और निराशा को वह अब और नहीं झेल सकतीं, क्योंकि इस प्रेम के कारण उन्होंने अपनी लाज और सम्मान गँवा दिया है

मन की लाज लज्जा, हया, शर्म, मान-मर्यादा

कार्नेलिया का गीत

अरुण यह मधुमय देश हमारा!

यह भारत देश सूर्य की सुनहरी किरणों के समान सुंदर और मधुर है, जहाँ लोगों के हृदय में प्रेम, दया और करुणा भरी हुई है

अरुण – सूर्योदय की लालिमा, भोर, सूर्य की पहली किरण, उगते सूरज का रंग

 मधुमय – भारत के निवासियों की दयालुता, भाईचारे और मेहमाननवाजी को दर्शाता है, जो यहाँ आने वाले हर व्यक्ति को शांति                     और सहारा देता है। 

 जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा

 भारत जैसे विशाल और उदार हृदय वाले देश में, दूर से आए हुए अजनबी लोगों को भी अपनापन और सहारा मिलता है,     जिससे वे यहाँ सुरक्षित महसूस करते हैं

अनजान क्षितिज – अजनबी लोग

सहारा – मदद, आश्रय

सरस तामरस गर्भ विभा पर-नाच रही तरुशिखा मनोहर।

सुंदर कमल के खिलने पर, पेड़ों की चोटी की परछाई उस पर नृत्य कर रही है।

भारत के प्राकृतिक सौंदर्य से मन मुग्ध है, जहाँ सूर्योदय के समय कमल के फूलों की आभा के बीच पेड़ों की मनोरम चोटियाँ नाचती हुई प्रतीत होती हैं

कमल के सुंदर तने की चमक पर, पेड़ों की चोटियाँ मनमोहक रूप से नाच रही हैं। यह सूर्योदय के समय के दृश्य का वर्णन है, जहाँ सूर्य की किरणें कमल पर पड़ रही हैं और पेड़ की डालियाँ हवा में हिल रही हैं, जो अत्यंत सुंदर और आकर्षक लग रहा है। 

सरस तामरस गर्भ विभा पर: खिलते हुए ताज़े कमल के फूलों के मध्य भाग की चमक या आभा पर।

सरस तामरस गर्भ विभा पर: कमल के गर्भ जैसी सुंदरता वाले, (सूरज की पहली किरण से) चमकदार और कोमल कमल के फूलों की आभा पर।

नाच रही तरुशिखा मनोहर: पेड़ों की सबसे ऊपरी चोटियाँ मनोहर तरीके से नृत्य कर रही हैं।

नाच रही तरुशिखा मनोहर: पेड़ों की सबसे ऊंची चोटियाँ जो मन को मोह लेती हैं, ऐसे लगता है मानो वे नाच रही हों।

नाच रही तरुशिखा मनोहर: पेड़ों की सबसे ऊपर की शाखाएँ हवा के कारण सुंदर ढंग से हिल रही हैं, जिससे ऐसा लगता है मानो वे नृत्य कर रही हों।

छिटका जीवन हरियाली पर: ऐसा लगता है जैसे हरियाली पर जीवन का उत्सव मनाया जा रहा है।

छिटका जीवन हरियाली पर: हरियाली से भरे दृश्य पर, मानो जीवन का उत्सव मनाया जा रहा हो।

मंगल कुंकुम सारा: हरियाली पर सूर्य की किरणें मंगलकारी कुमकुम (सिंदूर) की तरह बिखरी हुई हैं।

मंगल कुंकुम सारा: शुभ कुंकुम (लाल-सुनहरा रंग) की तरह पूरे वातावरण में छिटका हुआ हो।

मंगल कुंकुम सारा: जैसे शुभ और मंगलकारी कुमकुम (एक प्रकार का लाल रंग) बिखरा हो।

सरस तामरस: खिले हुए कमल (तामरस)।

गर्भ विभा: कमल की पंखुड़ियों या उसके गर्भ से निकलने वाली चमक या दीप्ति।

पर-नाच रही: उस चमक पर नृत्य कर रही हैं।

तरुशिखा: पेड़ की सबसे ऊपरी चोटी या शाखाएं।

मनोहर: मन को हरने वाला, सुंदर। 

छिटका जीवन हरियाली पर-मंगल कुंकुम सारा!

सुबह की सुनहरी किरणें जब हरी-भरी धरती पर पड़ती हैं, तो ऐसा लगता है मानो किसी ने शुभ और मंगलकारी कुंकुम (एक प्रकार का लाल रंग) छिड़क दिया हो

जीवन की हरियाली (खुशहाली) पर शुभ और मंगलकारी कुंकुम (सिंदूर/लाल रंग) बिखरा हुआ है।

छिटका जीवन हरियाली पर: जब सूर्य की किरणें हरी-भरी धरती पर पड़ती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे जीवन (खुशी, समृद्धि, हरियाली) धरती पर बिखरा हो।

छिटका जीवन हरियाली पर: यह पंक्ति जीवन में मौजूद सुख-शांति और समृद्धि को “हरियाली” के रूप में वर्णित करती है। “छिटका” का अर्थ है कि ये खुशियाँ जीवन में फैली हुई हैं।

मंगल कुंकुम सारा: यह लाल रंग को दर्शाता है, जो सुबह के सूर्योदय के समय प्रकृति की हरियाली पर दिखाई देता है। यह ‘मंगल’ यानी शुभ और कल्याणकारी है।

मंगल कुंकुम सारा: “कुंकुम” यहाँ सूर्य की सुबह की लालिमा का प्रतीक है, जो पूरी पृथ्वी पर फैली हुई है। “मंगल” का अर्थ है शुभता और “सारा” का मतलब है सब कुछ।

लघु सुरधनु से पंख पसारे-शीतल मलय समीर सहारे।

छोटे-छोटे इंद्रधनुष के समान रंगीन पंख फैलाए हुए पक्षी, मलय पर्वत से आने वाली ठंडी और मीठी हवा के सहारे उड़ रहे हैं, और जिस ओर मुँह करके उड़ रहे हैं, वह हमारा प्यारा भारत देश है

छोटे इंद्रधनुषों जैसे रंगीन पंख फैलाए हुए पक्षी, मलय पर्वत से आने वाली ठंडी हवा के सहारे, अपने प्यारे घोंसलों की ओर उड़ रहे हैं

लघु सुरधनु से पंख पसारे: पक्षियों के रंगीन पंखों की तुलना छोटे इंद्रधनुषों से की गई है।

लघु – छोटे

सुरधनु – इंद्रधनुष

शीतल मलय समीर सहारे: मलय पर्वत से आने वाली ठंडी और सुखद हवा का सहारा पाकर।

शीतल – ठंडी

मलय – मलय पर्वत

समीर – हवा

उड़ते खग जिस ओर मुँह किए-समझ नीड़ निज प्यारा।

जब पक्षी छोटे-छोटे इंद्रधनुष जैसे पंखों को मलय पर्वत से आती हुई शीतल हवा के सहारे फैलाकर अपने प्यारे घोंसलों की कल्पना करते हुए उड़ते हैं, तो वे उस देश की ओर जाते हैं, जहाँ उन्हें अपना घर लगता है

भारत एक ऐसा देश है जहाँ पक्षी भी अपने प्यारे घोंसलों को देखकर उसी की ओर उड़ते हैं, क्योंकि यहाँ सभी को आश्रय और सुरक्षा मिलती है

‘उड़ते खग जिस ओर मुँह किए’: इसका मतलब है कि उड़ते हुए पक्षी जिस दिशा में जाते हैं।

 खग – पक्षी

‘समझ नीड़ निज प्यारा’: इसका अर्थ है कि उन्हें अपना प्यारा घोंसला या बसेरा मिलता है।

नीड़ – घोंसला

निज – अपना

बरसाती आंखों के बादल-बनते जहां भरे करुणा जल।

भारत के लोग अत्यंत दयालु और करुणावान हैं। वे दूसरों के दुख को देखकर द्रवित हो जाते हैं और उनकी आँखों से करुणा के आँसू बहने लगते हैं, ठीक उसी तरह जैसे वर्षा ऋतु में बादल जल बरसाते हैं।  

‘बरसाती आँखों के बादल’: यह भारतवासियों के हृदय में करुणा और सहानुभूति की भावना का प्रतीक है।

‘जहां भरे करुणा जल’: इसका अर्थ है कि यह वह स्थान है जहाँ की आँखों में करुणा रूपी जल भरा हुआ है, जो दूसरों के दुख में आँसू बनकर निकलता है।

करुणा – दया, रहम।

लहरें टकराती अनंत की – पाकर जहाँ किनारा

जिस प्रकार अनंत सागर से आती हुई लहरें भी यहाँ (भारत में) आकर एक किनारा (आश्रय) पाती हैं और शांत हो जाती हैं, उसी प्रकार भारत अपने विशाल हृदय और करुणा के कारण बाहरी और विक्षुब्ध लोगों को भी शांति और सहारा प्रदान करता है

अनंत से आने वाली लहरें भी भारत में आकर किनारा (आश्रय) पाती हैं और शांत हो जाती हैं।

अनंत से आने वाली लहरें भी भारत में आकर अपना किनारा या आश्रय पाती हैं, ठीक उसी तरह जैसे भारत में आने वाले विभिन्न देशों के लोग शांति पाते हैं

अनंत से आने वाली लहरें भी भारत में आकर किनारा या सहारा पाकर शांत हो जाती हैं।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे – भरती ढुलकाती सुख मेरे

भोर के समय, उषा देवी (या भोर का सौंदर्य) एक सुनहरा घड़ा (हेम कुंभ) लेकर आती है, जिसमें से वह सुख को लोगों के जीवन में फैला देती है, जैसे कोई घड़े से पानी भरता या ढुलकाता है

भोर के समय उषा (भोर की देवी) अपने सोने के घड़े (हेम कुंभ) से सुख और समृद्धि का जल लाती है और उसे धरती पर ढुलका देती है, जिससे लोगों के जीवन में सुख भर जाता है

उषा (भोर) एक स्त्री है जो सोने के घड़े (हेम कुंभ) में सुबह का प्रकाश भरकर धरती पर लुढ़का देती है, जिससे लोगों के जीवन में सुख आता है

हेम कुंभ ले उषा सवेरे: यहाँ उषा (भोर) को सोने के घड़े (हेम कुंभ) के साथ एक पनिहारी के रूप में चित्रित किया गया है, जो सुबह होते ही अपना काम शुरू करती है।

हेम कुंभ: सोने का घड़ा।

उषा सवेरे: भोर के समय, उषा काल में।

उषा सवेरे: भोर की देवी या भोर का समय

भरती ढुलकाती सुख मेरे: इसका अर्थ है कि वह उस घड़े में सुख-समृद्धि का जल भरकर लाती है और उसे धरती पर उँडेल देती है, जिससे सभी को सुख मिलता है।

भरती ढुलकाती सुख मेरे: सुख फैलाती है, जो लोगों के जीवन में आनंद भर देता है।

भरती ढुलकाती सुख मेरे: सुख और समृद्धि को लाती है और उसे धरती पर बिखेर देती है

भरती ढुलकाती सुख मेरे: उषा द्वारा अपने सोने के घड़े में सुख व समृद्धि रूपी जल भरकर, उसे लोगों के जीवन पर लुढ़का देना।

मदिर ऊँघते रहते जब-जगकर रजनी भर तारा

मदिर ऊँघते रहते जब-जगकर रजनी भर तारा: रात भर जागने के बाद, तारे अब नींद में ऊँघने लगते हैं, क्योंकि भोर हो चुकी है और उनका काम समाप्त हो गया है। 

मदिर ऊँघते रहते जब-जगकर रजनी भर तारा: रात भर जागने के बाद तारे भी उषा के आगमन और सुख को देखकर ऊँघने लगते हैं।

रजनी – रात

Leave a Comment