सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला'(सन् 1898-1961)

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जीवन परिचय :

निराला का जन्म बंगाल में मेदिनीपुर ज़िले के महिषादल गाँव में हुआ था।

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उनका पितृग्राम (पिता या पूर्वजों का गाँव) उत्तर प्रदेश का गढ़कोला (उन्नाव) है।

उनके बचपन का नाम सूर्य कुमार था।

बहुत छोटी आयु में ही उनकी माँ का निधन हो गया।

निराला की विधिवत (नियम और क़ानून के अनुसार) स्कूली शिक्षा (स्कूली पढ़ाई) नवीं कक्षा तक ही हुई।

पत्नी की प्रेरणा से निराला की साहित्य और संगीत में रुचि पैदा हुई।

सन् 1918 में उनकी पत्नी का देहांत हो गया और उसके बाद पिता,चाचा,चचेरे भाई एक-एक कर सब चल बसे।अंत में पुत्री सरोज की मृत्यु ने निराला को भीतर तक झकझोर दिया।

अपने जीवन में निराला ने मृत्यु का जैसा साक्षात्कार किया था उसकी अभिव्यक्ति उनकी कई कविताओं में दिखाई देती है।

सन् 1916 में उन्होंने प्रसिद्ध कविता जूही की कली लिखी जिससे बाद में उनको बहुत प्रसिद्धि मिली और वे मुक्त छंद के प्रवर्तक भी माने गए।

निराला सन् 1922 में रामकृष्ण मिशन द्वारा प्रकाशित पत्रिका समन्वय के संपादन से जुड़े।

सन् 1923-24 में वे मतवाला के संपादक मंडल में शामिल हुए।

वे जीवनभर पारिवारिक और आर्थिक कष्टों से जूझते रहे।

अपने स्वाभिमानी स्वभाव के कारण निराला कहीं टिककर काम नहीं कर पाए।

अंत में इलाहाबाद आकर रहे और वहीं उनका देहांत हुआ।

छायावाद और हिन्दी की स्वच्छंदतावादी कविता के प्रमुख आधार स्तंभ निराला का काव्य-संसार बहुत व्यापक हैं।

उनमें भारतीय इतिहास,दर्शन और परंपरा का व्यापक बोध है और समकालीन जीवन के यथार्थ के विभिन्न पक्षों का चित्रण भी।

भावों और विचारों की जैसी विविधता,व्यापकता और गहराई निराला की कविताओं में मिलती है वैसी बहुत कम कवियों में है।

उन्होंने भारतीय प्रकृति और संस्कृति के विभिन्न रूपों का गंभीर चित्रण अपने काव्य में किया है। भारतीय किसान जीवन से उनका लगाव उनकी अनेक कविताओं में व्यक्त हुआ है।

यद्यपि निराला मुक्त छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं तथापि उन्होंने विभिन्न छंदों में भी कविताएँ लिखी हैं।

उनके काव्य-संसार में काव्य-रूपों की भी विविधता है।

एक ओर उन्होंने राम की शक्त्ति पूजा और तुलसीदास जैसी प्रबंधात्मक कविताएँ लिखीं तो दूसरी ओर प्रगीतों की भी रचना की।

उन्होंने हिंदी भाषा में ग़ज़लों की भी रचना की है।

उनकी सामाजिक आलोचना व्यंग्य के रूप में उनकी कविताओं में जगह-जगह प्रकट हुई है।

निराला की काव्यभाषा के अनेक रूप और स्तर हैं। 

राम की शक्त्ति पूजा और तुलसीदास में तत्समप्रधान पदावली है तो भिक्षुक जैसी कविता में बोलचाल की भाषा का सृजनात्मक प्रयोग।

भाषा का कसाब,शब्दों की मितव्ययिता और अर्थ की प्रधानता उनकी काव्य-भाषा की जानी-पहचानी विशेषताएं हैं।

निराला की प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं- परिमल, गीतिका, अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, नए पत्ते, बेला, अर्चना, आराधना, गीतगुंज आदि।

निराला ने कविता के अतिरिक्त कहानियाँ और उपन्यास भी लिखें।

उनके उपन्यासों में बिल्लेसुर बकरिहा विशेष चर्चित हुआ।

उनका सम्पूर्ण साहित्य निराला रचनावली के आठ खंडों में प्रकाशित हो चुका है।

  1. पितृग्राम – पिता या पूर्वजों का गाँव
  2. छोटी आयु – कम उम्र
  3. निधन – मृत्यु 
  4. विधिवत – नियम और क़ानून के अनुसार
  5. स्कूली शिक्षा – स्कूली पढ़ाई
  6. प्रेरणा – किसी कार्य को करने के लिए उत्पन्न होने वाली भावना, उत्साह या प्रोत्साहन
  7. रुचि – दिलचस्पी,शौक़
  8. देहांत – मृत्यु , मौत , निधन
  9. झकझोर – मन को हिलाना: किसी बात से मन में हलचल मचाना, जैसे “उसकी बातों ने मेरे मन को झकझोर दिया”। 
  10. साक्षात्कार – मुलाकात
  11. अभिव्यक्ति – विचारों, भावनाओं या इच्छाओं को प्रकट करना या व्यक्त करना।
  12. प्रसिद्ध – मशहूर
  13. प्रसिद्धि – सफलता
  14. प्रवर्तक – वह जिसने कोई काम प्रचलित या आरंभ किया हो , संस्थापक 
  15. प्रकाशित – जो छापा हो।
  16. पत्रिका – नियमित रूप से निकलनेवाली पुस्तिका। , magazine
  17. समन्वय – यह एक पत्रिका (magazine) का नाम है। 
  18. संपादन – किसी लेख, पुस्तक, या अन्य सामग्री को सुधारना, व्यवस्थित करना और प्रकाशन या प्रस्तुति के योग्य बनाना।, 1. क्या है: लिखित कार्य को प्रकाशन के लिए तैयार करने की प्रक्रिया।, 2. मुख्य कार्य: इसमें किसी पाठ में बदलाव करना शामिल है, जैसे कि विचारों को जोड़ना, हटाना या वाक्यों को पुनर्व्यवस्थित करना।, 3. प्रक्रिया: यह एक प्रक्रिया है जो कई चरणों में हो सकती है, जैसे कि विकासात्मक संपादन (बड़े बदलाव), लाइन संपादन (वाक्य-स्तरीय), और प्रूफरीडिंग (छोटी-मोटी त्रुटियाँ)। 4. उद्देश्य: किसी पाठ को और अधिक पठनीय और प्रभावी बनाना। 
  19. संपादक (An editorial) – 1. कौन हैं: एक व्यक्ति जो लिखित सामग्री को सुधारता है। वे लेखक की मदद करते हैं। 2. मुख्य कार्य: एक पेशेवर व्यक्ति जो पाठ को स्पष्टता, सटीकता और प्रभाव के लिए परिष्कृत करता है। 3. विशेषज्ञता: कई प्रकार के संपादक होते हैं, जैसे कि विकासात्मक संपादक (जो संरचना और कहानी पर ध्यान केंद्रित करते हैं) या कॉपी संपादक (जो व्याकरण और शैली पर काम करते हैं)। 4. ज़िम्मेदारी: लेखक के विचारों को स्पष्ट और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में मदद करते हैं। 
  20. संपादक मंडल
  21. जीवनभर – पूरा जीवन ,आजीवन ,जिंदगी भर ,जीवन के आरम्भ से लेकर अंतिम समय तक या आजीवन।
  22. पारिवारिक – परिवार से संबंध रखनेवाला।
  23. आर्थिक कष्टों – रुपये-पैसे या धन की कमी।
  24. जूझना – संघर्ष करना, लड़ना, या किसी कठिन परिस्थिति का सामना करना।
  25. स्वाभिमानी स्वाभाव – आत्म-सम्मान और आत्म-गौरव की भावना।
  26. स्वाभिमानी – आत्म-सम्मान वाला व्यक्ति
  27. स्वाभाव – सहज प्रकृति,आदत, नेचर।
  28. व्यापक – विस्तृत या फैला हुआ
  29. व्यापक बोध – एक बहुत व्यापक या विस्तृत समझ।
  30. व्यापक – जो दूर तक फैला हुआ हो
  31. बोध – समझ, ज्ञान
  32. समकालीन – एक ही समय में विद्यमान या घटित होने वाला” या “वर्तमान”।
  33. जीवन – ज़िंदगी
  34. समकालीन जीवन –  वर्तमान समय (आज का दौर) से जुड़ा हुआ या उस समय के अनुसार जीवन जीना
  35. यथार्थ – जैसा होना चाहिए ठीक वैसा ,वास्तविकता, सच्चाई, या जो जैसा है, ठीक वैसा ही होना
  36. विभिन्न – अलग – अलग 
  37. पक्षों – sides, दृष्टिकोण
  38. विभिन्न पक्षों – किसी विषय या स्थिति के अलग-अलग पहलू, दृष्टिकोण, या हिस्से हैं, जो सकारात्मक (पक्ष) और नकारात्मक (विपक्ष) भी हो सकते हैं, जैसे किसी निर्णय के फायदे-नुकसान।
  39. चित्रण – किसी विचार, कहानी, या जानकारी को दृश्य रूप (जैसे चित्र, रेखाचित्र, या आरेख) में प्रस्तुत करना ताकि वह अधिक स्पष्ट, आकर्षक और समझने योग्य बन सके।
  40. भावों – मन में उठने वाली भावनाएँ, विचार
  41. विचारों – मन में चलने वाली मानसिक प्रक्रियाएँ, जो किसी चीज़ के बारे में सोचने, समझने, कल्पना करने या राय बनाने से जुड़ी होती हैं
  42. विविधता – अनेकता या भिन्न-भिन्न (अलग-अलग) प्रकारों का होना
  43. व्यापकता – किसी चीज़ का बड़े दायरे में फैला होना
  44. भारतीय प्रकृति – भारत की प्रकृति अत्यंत विविध है, जिसमें उत्तर में हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर दक्षिण के उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों तक, विशाल मैदानों, रेगिस्तानों, पठारों, और तटरेखाओं की विविधता शामिल है, जो इसे एक अद्वितीय भौगोलिक पहचान देती है और समृद्ध जैव विविधता (8% वैश्विक विविधता) का घर बनाती है, जो कई ऋतुओं और सूक्ष्म-जलवायु क्षेत्रों को जन्म देती है, जहाँ नदियाँ जीवनदायिनी हैं और हिमालय जलवायु को नियंत्रित करता है।  
  45. भारतीय संस्कृति संस्कृति और प्रकृति का संबंध गहरा और अविभाज्य है, जहाँ प्रकृति (पर्यावरण, जीव-जंतु, भौतिक जगत) मानव समाज के रहन-सहन, विश्वास, कला और रीति-रिवाजों (संस्कृति) को प्रभावित करती है, और बदले में संस्कृति भी प्रकृति को बदलती है
  46. विभिन्न रूपों – किसी चीज़ के अलग-अलग प्रकार, अवस्थाएँ, या रूप
  47. गंभीर – गहरा
  48. चित्रण – किसी विचार, कहानी, या जानकारी को चित्रों (जैसे पेंटिंग, रेखाचित्र, तस्वीरें) या उदाहरणों के ज़रिए दृश्य रूप से प्रस्तुत करना ताकि वह स्पष्ट, आकर्षक और समझने में आसान हो जाए।
  49. गंभीर चित्रण – किसी व्यक्ति, स्थिति या कहानी को गहरे, निराशावादी या दुखद रूप में दिखाना है।
  50. काव्य – कविता
  51. व्यक्त – प्रकट किया गया।
  52. यद्यपि – हालांकि
  53. मुक्त छंद – कविता का वह रूप है जिसमें तुकबंदी (rhyme) और छंद (meter) के कठोर नियमों का पालन नहीं किया जाता।
  54. प्रवर्तक – किसी काम, विचार, संस्था, या आंदोलन को शुरू करने वाला, जन्म देने वाला, या उसे आगे बढ़ाने वाला व्यक्ति।
  55. तथापि – तो भी, फिर भी।
  56. विभिन्न – पृथक,अलग-अलग।
  57. छंदों – वर्णों और मात्राओं की निश्चित व्यवस्था से युक्त पद्य रचना, जो एक खास लय और प्रवाह के साथ होती है।
  58. ओर – तरफ
  59. प्रबंधात्मक – प्रबंध करने से संबंधित, व्यवस्था या नियंत्रण के कौशल या प्रक्रिया से जुड़ा हुआ।
  60. प्रगीतों – एक प्रकार की छोटी, गेय (गाना योग्य) कविता होती है, जो कवि के व्यक्तिगत भावों, विचारों और अनुभूतियों की आत्मपरक अभिव्यक्ति होती है।
  61. सामाजिक – 1.समाज का (जैसे—सामाजिक सुधार)।, 2.समाज से संबंधित (जैसे—सामाजिक रीति–रिवाज़)।
  62. आलोचना – किसी व्यक्ति, वस्तु, या कृति के गुण-दोषों का विश्लेषण और मूल्यांकन करना, जिसमें उसकी अच्छाइयों और कमियों दोनों पर विचार किया जाता है, ताकि उसके बारे में एक सूचित निर्णय या टिप्पणी दी जा सके। 
  63. सामाजिक आलोचना (Social Criticism) का अर्थ है – समाज की मौजूदा संरचनाओं, मूल्यों, मानदंडों और प्रथाओं का विश्लेषण और मूल्यांकन करना, ताकि उसमें मौजूद अन्याय, असमानताओं और कमियों को उजागर किया जा सके और बेहतर, न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए बदलाव या सुधार का मार्ग सुझाया जा सके. यह कला, साहित्य, पत्रकारिता और अकादमिक लेखन जैसे विभिन्न माध्यमों से की जाती है, जिसका लक्ष्य लोगों में सोचने की क्षमता जगाना और सामाजिक समस्याओं (जैसे उत्पीड़न, भेदभाव, उपभोक्तावाद) के प्रति जागरूक करना है. 
  64. व्यंग्य – एक साहित्यिक या संचार उपकरण है जिसमें किसी व्यक्ति, समाज या संस्था की मूर्खता, दोषों या बुराइयों की आलोचना करने के लिए हास्य, विडंबना (irony), अतिशयोक्ति या उपहास का प्रयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल हँसाना नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करना और सुधार लाना होता है।
  65. कविताओं
  66. प्रकट – जाहिर,उजागर,जो सबके सामने हो या सामने आया हुआ।
  67. काव्यभाषा – काव्य भाषा वह विशिष्ट भाषा शैली है जिसका प्रयोग कविता या साहित्यिक रचनाओं में होता है, जो सामान्य बोलचाल की भाषा (जनभाषा) से अलग होती है, जिसमें चुने हुए शब्दों, अलंकारों (जैसे रूपक, उपमा), लय और बिंबों (छवियों) का प्रयोग करके गहरी भावनाओं और कल्पनाओं को कलात्मक रूप से व्यक्त किया जाता है, ताकि पाठक पर गहरा प्रभाव पड़े और अर्थ की कई परतें खुलें। यह भाषा कृत्रिमता, प्रतीकात्मकता और भावनात्मक गहराई से युक्त होती है, जो सामान्य भाषा के सीधेपन से भिन्न होती है।
  68. अनेक रूप – कई रूप वाला”, “विभिन्न आकार या प्रकार वाला”, या “बहुरूपी”।
  69. स्तर – परत, level, scale
  70. तत्समप्रधान – ऐसे शब्द जो संस्कृत भाषा से बिना किसी बदलाव (ज्यों के त्यों) के हिन्दी में शामिल किए गए हैं।
  71. पदावली
  72. सृजनात्मक – कुछ नया रचने, बनाने या आविष्कार करने की क्षमता।
  73. प्रयोग – इस्तेमाल
  74. भाषा का कसाब – “भाषा का कसाब” उस व्यक्ति को कहते हैं जो भाषा के काम (लिखना, बोलना, समझाना) में माहिर हो।
  75. शब्दों की मितव्ययिता – कम से कम शब्दों का प्रयोग करके अपनी बात को प्रभावी ढंग से कहना।
  76. मितव्ययिता – कम ख़रची।
  77. अर्थ की प्रधानता – किसी चीज़ के मतलब, सार या उद्देश्य को सबसे महत्वपूर्ण मानना, उसे सर्वोच्चता देना।
  78. प्रधानता – इसका अर्थ मुख्य, प्रमुख, श्रेष्ठ या सबसे महत्वपूर्ण होना है।
  79. के अतिरिक्त – के अलावा
  80. विशेष -अधिक 
  81. चर्चित – लोकप्रिय/प्रसिद्ध
  82. सम्पूर्ण साहित्य –
  83. सम्पूर्ण – सारा, पूरा
  84. साहित्य भाषा के माध्यम से मानव के विचारों, भावनाओं और अनुभवों की रचनात्मक और कलात्मक अभिव्यक्ति, जिसमें लिखित और मौखिक दोनों तरह की रचनाएँ (जैसे कहानियाँ, कविताएँ, नाटक) शामिल होती हैं, जो ज्ञान और संस्कृति का संचार करती हैं और मनोरंजन के साथ-साथ समाज को समझने में मदद करती हैं. यह शब्द संस्कृत के ‘हित’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है ‘कल्याण’ या ‘भलाई’, यानी जो ‘हित के साथ’ हो, वह साहित्य है. 
  85. खंडों – हिस्सा, भाग, टुकड़ा या अंश होता है।
  86. प्रकाशित – कोई चीज़, जैसे किताब, लेख, या जानकारी, छप चुकी है, छपाई की प्रक्रिया पूरी कर चुकी है, और अब सार्वजनिक रूप से उपलब्ध (जारी) है, या कम से कम प्रकाशन के लिए तैयार है, यानी वह अब “आम लोगों के सामने” आ चुकी है और उसका प्रकाशन कार्य समाप्त हो गया है, जैसे कोई किताब बाजार में मिल रही हो

सरोज स्मृति कविता निराला की दिवंगत (मृतस्वर्गीय या जो मर चुका हो) पुत्री सरोज पर केंद्रित है। यह कविता बेटी के दिवंगत (मृत, स्वर्गीय, जो मरा हुआ हो।) होने पर पिता का विलाप है। पिता के इस विलाप में कवि को कभी शकुंतला की याद आती है कभी अपनी स्वर्गीय (स्वर्ग का) पत्नी की। बेटी के रूप रंग में पत्नी का रूप रंग दिखाई पड़ता है, जिसका चित्रण (वर्णन) निराला ने किया है। यही नहीं इस कविता में एक भाग्यहीन पिता का संघर्ष (टकराव, स्ट्रगल,लड़ाई),समाज से उसके सम्बन्ध (लगाव, रिश्ता या जुड़ाव), पुत्री के प्रति (के लिए) बहुत कुछ न कर पाने का अकर्मण्यता (निकम्मापन, आलस्य) बोध (ज्ञान) भी प्रकट (उजागर,व्यक्त,जाहिर) हुआ है। इस कविता के माध्यम से निराला का जीवन-संघर्ष (जीवन में आने वाली चुनौतियों और कठिनाइयों का दृढ़तापूर्वक सामना करना) भी प्रकट हुआ है। वे कहते हैं-‘दुख ही जीवन की कथा रही (कवि के जीवन में दुख और कष्ट ही प्रमुख रहे हैं) क्या कहूँ आज जो नहीं कही'(जीवन में ऐसे बहुत से दुख हैं जो व्यक्ति व्यक्त नहीं कर पाता, जिन्हें शब्दों में बयां करना मुश्किल है।)

सरोज स्मृति

देखा विवाह आमूल नवल,

विवाह के समय को पूरी तरह से एक नए और अद्भुत रूप में देखा” यहाँ ‘अमूल नवल’ का अर्थ है “बिल्कुल नया और अनोखा” और यह विवाह के दृश्य के सौंदर्य और नवीनता को दर्शाता है। जिसमें कवि अपनी पुत्री सरोज के विवाह का वर्णन कर रहे हैं। देखा विवाह: कवि अपनी बेटी सरोज के विवाह को देख रहे हैं। अमूल नवल: ‘अमूल’ का अर्थ है “मूल्यवान” या “बेहद” और ‘नवल’ का अर्थ है “नया” या “नवीन”। यह दर्शाता है कि विवाह का दृश्य बहुत ही अद्भुत और अनोखा था, जिसे कवि ने पूरी तरह से एक नए संदर्भ में देखा।

तुझ पर शुभ पड़ा कलश का जल।

विवाह जैसे शुभ अवसर पर तुम्हारे ऊपर पवित्र कलश का जल छिड़का गया।

देखती मुझे तू हँसी मन्द,

वह एक हल्की, मंद मुस्कान के साथ देख रही थी। “हँसी मन्द” का अर्थ है धीमी या मंद मुस्कान और “देखती” का अर्थ है देखना।

“देखती मुझे”: इसका अर्थ है मुझे देख रही थी।

“तू”: यह कवि की बेटी, सरोज के लिए प्रयुक्त हुआ है।

“हँसी मन्द”: इसका अर्थ है धीमी या मंद मुस्कान। 

होठों में बिजली फँसी स्पंद 

होठों का बहुत तेज़ी से काँपना या फड़कना, जो तीव्र भावनाओं (जैसे खुशी, उत्तेजना या घबराहट) के कारण होता है।

उर में भर झूली छबि सुन्दर

कवि की बेटी (सरोज) के हृदय में उसके पति की सुंदर छवि बसी हुई थी।

प्रिय की अशब्द शृंगार-मुखर

कवि की प्रियतमा (पत्नी) का सौंदर्य उसकी बेटी सरोज में साकार हो गया था, जिसे कवि बिना बोले ही महसूस कर रहा था।

अशब्द: बिना बोले या कहे, मौन रूप से।

शृंगार-मुखर: श्रृंगार का सौंदर्य बोलता हुआ या अभिव्यक्त होता हुआ।

तू खुली एक-उच्छ्वास-संग,

तुम्हारी सुंदरता और तुम्हारा रूप-सौंदर्य एक गहरी सांस की तरह विकसित हुआ है, जो तुम्हारे अंग-प्रत्यंग में समा गया है।

‘उच्छ्वास’: यहाँ इसका अर्थ है “एक गहरी साँस” या “एक उद्गार”।

‘संग’: यहाँ इसका अर्थ है “के साथ” या “में”।

उच्छ्वास-संग : एक गहरी साँस के साथ।

विश्वास-स्तब्ध बंध अंग-अंग

विश्वास से बंधा हुआ, हर अंग-अंग।

विश्वास-स्तब्ध: इसका अर्थ है विश्वास से जकड़ा हुआ, या विश्वास से भरा हुआ।

बंध: इसका अर्थ है बंधन, रिश्ता।

अंग-अंग: इसका अर्थ है शरीर का हर अंग, या हर एक हिस्सा।

नत नयनों से आलोक उतर

झुकी हुई (लजाई हुई) आँखों से प्रकाश (सुंदरता या चमक) उतर कर होंठों पर आ गया है।

नत नयन: झुकी हुई आँखें, जो लज्जा और संकोच को दर्शाती हैं।

आलोक: प्रकाश, चमक या सौंदर्य।

उतर: नीचे उतरना, एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना। 

काँपा अधरों पर थर-थर-थर।

होठों का डर, घबराहट या सर्दी के कारण लगातार और बुरी तरह काँपना।

काँपा: काँप गया।

अधरों पर: होठों पर।

थर-थर-थर: डर या सर्दी से बहुत ज़्यादा काँपना; कंपकंपी होना। 

देखा मैंने, वह मूर्ति-धीति

मूर्ति: यहाँ सरोज के शारीरिक सौंदर्य, उसके सौन्दर्य में डूबने और प्रकाश के चमकने को दर्शाया गया है।

धीति: यह उसके अंदर की बुद्धि और विवेक को दर्शाता है, जो उसके सौन्दर्य में झलकता है। 

मेरे वसंत की प्रथम गीति—

कवि के जीवन के शुरुआती वसंत काल के शुरुआती और मधुर गीत है।

शृंगार, रहा जो निराकार,

ऐसा श्रृंगार जो आकार या रूप से परे हो, जो केवल कल्पनाओं में मौजूद था लेकिन अब साकार हो गया है।

निराकार श्रृंगार: यह वह श्रृंगार है जिसका कोई भौतिक रूप नहीं था, बल्कि वह कवि की कविताओं और कल्पनाओं में मौजूद था।

साकार श्रृंगार: यह कवि की बेटी सरोज के नववधू रूप में दिखाई देने वाला श्रृंगार है, जो कवि की कविताओं के निराकार श्रृंगार को साकार करता है।

रस कविता में उच्छ्वसित-धार

उच्छ्वसित: इसका अर्थ है उत्साहित, प्रसन्न या उमड़ा हुआ।

धार: इसका अर्थ है प्रवाह, धारा या बहाव।

उच्छ्वसित-धार- उत्साह और आनंद की धारा।

गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग-

(मेरी) प्यारी स्वर्गीय पत्नी के साथ गाया गया (मेरे) गीतों का राग-रंग।

गाया: मेरे द्वारा गाया गया या जो गाया जाता है।

स्वर्गीया-प्रिया: जो अब स्वर्ग में है और प्रिय थी, यानी कवि की स्वर्गीय पत्नी।

संग: साथ में।

भरता प्राणों में राग-रंग,

मेरे प्राणों में अनुराग (प्यार) और आनंद-उत्सव का भाव भरा हुआ है।”।

भरता प्राणों में: कवि के जीवन और प्राणों में यह भाव भरा हुआ है।

राग-रंग का अर्थ: आनंद-मंगल, उत्सव, और गाना-बजाना।

रति-रूप प्राप्त कर रहा वही,

वह अपनी दिवगंत (मृत, स्वर्गीय) पुत्री सरोज के रूप को प्राप्त कर रहा है, यानी सरोज के रूप में ही उसकी पत्नी का रूप दिखाई दे रहा है।

रति-रूप: इसका सीधा अर्थ है ‘रति का रूप’। यहाँ ‘रति’ का मतलब है प्रेम और सुंदरता।

एकत्रित/एक-जैसा रूप: कवि को अपनी पुत्री सरोज के रूप में अपनी दिवंगत (मृत, स्वर्गीय) पत्नी की छवि दिखती है, और वे दोनों रूप एक ही लगते हैं।

आकाश बदल कर बना मही।

कवि की श्रृंगार-युक्त कल्पनाएं (आकाश) उसकी पुत्री सरोज के नव-वधू रूप में साकार हो गईं (मही)। 

आकाश: यहाँ कवि की विस्तृत, कल्पनाशील और श्रृंगार-युक्त भावनाओं और विचारों का प्रतीक है।

मही: इसका अर्थ ‘धरती’ है, जो कवि की कल्पनाओं के साकार होने और सरोज के वास्तविक, श्रृंगार-पूर्ण रूप को दर्शाता है।

“हो गया ब्याह, आत्मीय स्वजन कोई थे नहीं, न आमंत्रण था भेजा गया”:

विवाह हो गया, लेकिन कोई अपने लोग (रिश्तेदार) नहीं थे और न ही किसी को बुलाया गया था, जो एक अकेलेपन और विरक्ति का भाव दर्शाता है.

आत्मीय स्वजन: अपने करीबी और सगे-संबंधी, यानी परिवार के लोग और रिश्तेदार।

विवाह-राग भर रहा न घर निशि-दिवस-जाग:

घर में दिन-रात विवाह के गीत गूँज रहे थे, पर यह खुशी की बजाय एक खालीपन भरी धुन थी, क्योंकि अपने कोई नहीं थे.

विवाह-राग: विवाह (शादी) के अवसर पर गाया जाने वाला गीत या संगीत है।

निशि-दिवस-जाग:  रात-दिन जागना या लगातार सतर्क रहना।

निशि: रात

दिवस: दिन 

जाग: जागना या जागृत रहना।

प्रिय मौन एक संगीत भरा नव जीवन के स्वर पर उतरा:

इस शोरगुल के बीच, एक गहरा मौन था, जो एक मधुर संगीत की तरह था, जो नए जीवन (सरोज के जीवन) के स्वर पर उतरा, लेकिन यह एक उदास, शांत संगीत था, जो कवि की बेटी की याद दिलाता था।

प्रिय मौन: एक ऐसा शांत रहना जो हमें प्रिय या पसंद हो, जो सिर्फ़ चुप्पी नहीं बल्कि मन की शांति, एकाग्रता, आत्म-चिंतन और आंतरिक ऊर्जा का स्रोत हो सकता है।

नव जीवन: नया जीवन।

स्वर : आवाज़।

माँ की कुल शिक्षा मैंने दी, पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची:

कवि अपनी बेटी सरोज से कह रहे हैं कि उसकी माँ बचपन में ही चल बसी थी, तो मैंने ही तुम्हें वो सारी शिक्षा दी जो एक माँ देती है; और तुम्हारे विवाह के समय तुम्हारी फूलों की सेज भी मैंने ही सजाई थी।

सोचा मन में—’वह शकुंतला, पर पाठ अन्य यह, अन्य कला’:

कवि के मन में विचार आया कि जिस तरह कण्व ऋषि की बेटी शकुंतला माँ विहीन थी, उसी तरह सरोज भी थी, लेकिन यह तो कोई और कहानी है; शकुंतला का जीवन-पाठ और सरोज का जीवन-पथ (कला) दोनों अलग-अलग हैं। 

कुछ दिन रह गृह, तू फिर समोद:

कुछ दिन अपने घर (ससुराल) में आनंद और उल्लास के साथ रहो।

बैठी नानी की स्नेह-गोद: 

फिर (यानी अपनी माँ की तरह) नानी की प्यार भरी गोद में बैठना (यानी अपने मायके आना)।

 मामा-मामी का रहा प्यार, भर जलद धरा को ज्यों अपार:

मामा और मामी का प्यार, सागर (जलद) जितना गहरा और धरती (धरा) जितना विशाल था।

वे ही सुख-दु:ख में रहे न्यस्त, तेरे हित सदा समस्त, व्यस्त:

वे (मामा-मामी) तुम्हारे (सरोज के) सुख-दुख में हमेशा लगे रहते थे, तुम्हारे लिए हमेशा व्यस्त रहते थे।

वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली, स्नेह से हिली, पली:

वह लता (शायद सरोज खुद) वहीं की थी, जहाँ तुम कली के रूप में खिलीं, प्यार से पली-बढ़ीं।

अंत भी उसी गोद में शरण ली, मूँदे दृग वर महामरण! :

अंत में, तुमने (सरोज ने) उसी गोद (मामा-मामी की) में शरण ली और अपनी आँखें (दृग) मूँद लीं, जो एक महान (वर) मृत्यु (मरण) थी।

मुझ भाग्यहीन की तू संबल:

मैं दुर्भाग्यशाली हूँ, मेरा सहारा (बचाव) तुम बनो।

मैं एक अभागा हूँ, और तू (सरोज) ही मेरा एकमात्र सहारा थी।

‘मैं अभागा हूँ, लेकिन तू (सरोज) मेरा सहारा थी’।

युग वर्ष बाद जब हुई विकल:

जब युगों-युगों (लंबे समय) बाद तुम (सरोज) बीमार पड़ीं/अकेली हुईं

‘बहुत लंबे समय (युगों जैसे लंबे समय) के बाद, जब वह (सरोज) कमजोर या दुखी हुई’।

“दुख ही जीवन की कथा रही”:

‘उसका जीवन केवल दुःख की कहानी बनकर रह गया’।

“क्या कहूँ आज, तो नहीं कही”:

‘अब मैं क्या कहूँ, जो पहले नहीं कह पाया’।

“हो इसी कर्म पर वज्रपात”:

यदि धर्म (कर्तव्य) का पालन करने पर भी यह परिणाम (दुखद मृत्यु) मिलता है, तो इस तरह के कर्म पर वज्र गिरे (यानी, ऐसा कर्म व्यर्थ है)।

“यदि धर्म, रहे नत सदा माथ”:

यदि धर्म (कर्तव्य) के प्रति सिर झुकाए (समर्पित) रहने के बाद भी ऐसी दशा हो।

“इस पथ पर, मेरे कार्य सकल”:

इस जीवन-पथ पर मेरे सभी कर्म।

“हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल!”:

शीत (ठंड) में कमल की पंखुड़ियाँ मुरझा जाती हैं, वैसे ही मेरे सारे कर्म निष्फल या भ्रष्ट हो जाएँ।

कन्ये,गत कर्मों का अर्पण:

हे पुत्री,अपने बीते हुए समस्त कार्यों को (जो तुम्हारे लिए करने थे) समर्पित कर।

कर करता मैं तेरा तर्पण:

मैं तुम्हारा तर्पण (स्मरण/श्राद्ध) कर रहा हूँ।


निराला की प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं –

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